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राजल माता (चराडवा)

    आई राजळ माता की कथा  श्री राज बाई का जन्म स्थान गुजरात के सौराष्ट्र धांगध्रा तालुका के चराडवा गाँव मै वाचाशाखा के चारण उदयराज के घर हुआ......वाचाशाखा के पुरुष और स्त्रिया वाग्देवी वाणी सरस्वती के उपासक थे ...इनकी वाणी की वचन सिद्धि प्राप्त थी और इसीलिए ये वाचा कहलाये ....गुजराती साहित्य के प्रसिद्द विद्वान पींगलसी परबतजी पायक द्वारा लिखित "पूज्य आई माँ सोनबाई माँ मातृदर्शन जीवन इतिहास संहिता" के अनुसार राजबाई का जन्म विक्रम संवत 1595 के माघ सुद शुक्ल पक्ष मै हुआ .....इनका जन्म लोकपुज्य देवी करणी माता के स्वर्ग धाम पधारने के लगभग 10 महीने बाद हुआ....इन्हें करणी माता की अवतारी देवी माना जाता है ....श् अकबर की समकालीन थी ....राजबाई ने 80 वर्ष की आयु प्राप्त की और विक्रम संवत 1676 में आप स्वर्ग धाम पधारी....श्री राजबाई आजीवन ब्रम्हाचारीणी रही...उनके पिता उदा वाचा महापुण्यशाली पवित्र आचरण वाले विद्वान्, भक्त, वचनसिद्ध, पुरुषार्थी और साधन संपन्न थे .. .पूर्व जन्म के कर्मो एवं जीवन की तपस्या के कारण ही उनकी पुत्री के रूप मै लोकदेवी राजबाई का ज...

કવિ દુલા ભાયા કાગ (ભગત બાપુ)

કવિ કાગ ને ભગતબાપુ નામ કેવી રીતે મળ્યું તેનો એક પ્રસંગ..         ̄ ̄ ̄ ̄ ̄ ̄ ̄ ̄ આઈમા સોનલમાને કાને ઊડતી ઊડતી વાત આવી કે, કવિ કાગ એમના ઘરેથી—એમનાં પત્નીને બોલાવતા નથી. સોનલમાને મનમાં ખૂબ જ રીસ ચડી કે ‘આંગણિયાં પૂછીને કોઈ આવે રે આવકારો મીઠો આપજે…!’ જેવા રૂડા સંસ્કાર, સભ્યતા, સંસ્કૃતિ અને સમજણનાં ભજનો, ગીતો, દુહા-છંદને સમાજ-સાહિત્યને ચરણે ધરનારો લોકકવિ- લોકગાયક દુલા ભાયા કાગ એમના પારિવારિક જીવનમાં પોતાના ધર્મપત્ની સાથે આવું અન્યાયી વલણ કાં અપનાવે..? રેડિયો ઉપર ‘ગાતા સરવણ’નો ગાયક, લોકરામાયણનો જાણતલ આવડી મોટી ભૂલ કાં અદરી બેઠો…? આવો હળહળતો અન્યાય…? રામભાઇ કાગ જેવો પનોતો પુત્રરત્ન દેનારી એમની જીવન- સંગિનીને જાતી ઉંમરે કેમ તરછોડી હશે? એ સમયે સમગ્ર ચારણસમાજના સાડા ત્રણ પહાડા (વિભાગો)ના એકીકરણનો મંત્ર લઈને સમાજોત્થાન માટે લોબડિયાળી આઈ સોનબાઈ નીકળેલાં … ‘ ચારણ એક ધારણ’ ‘કન્યા કેળવણી’ અને ‘સમાજમાંથી વ્યસન નાબૂદી’-આવાં ત્રણ વ્રતનું ત્રિશૂળ મનમાં ધારીને આઈમા સોનલમા ગુજરાત, કચ્છ, કાઠિયાવાડમાં ચારણોના નેસડે નેસડે—ગામોગામ ઘૂમી રહ્યાં હતાં તે વખતની આ સત્ય ઘ...

ભૂચર મોરી મહાયુદ્ધ

સૌરાષ્ટ્ર ના મહાન યુદ્ધ ભૂચરમોરી વિશે ની ભવિષ્યવાણી આ યુદ્ધ સૌરાષ્ટ્ર કાઠીયાવાડ નું સૌથી મોટું યુદ્ધ હતું . જેમાં એક શરણે આવેલા ને રક્ષણ આપવું એ ક્ષત્રિય ધર્મ છે એવું સમ...

સોનલમાઁનાં એકાવન આદેશ

🙏🏻🙏🏻 *आइ सोनल आदेश* 🙏🏻🙏🏻 सतवादी चारण बनो, काढो कुटुंब कलेश... छोडो दारु चारणो, (इ) आइ सोनल आदेश...१ दाम माटे कोइ दीकरी, वेंचो नहीं लघुलेश... दैत वृत्ती छोडीद्यो, (इ) आइ सोनल आदेश...२ चोरी जारी चुगली, काढो जुगार कलेश... नीतिथी चारण नभो, (इ) आइ सोनल आदेश...३ कुरिवाजो काढवा, वरतो समय विशेष... कारज भोजन भंग करो, (इ) आइ सोनल आदेश...४ मही पर छोडो मांगवु, वधो पुरुषार्थ वेश... नेक टेक राखो नवड, (इ) आइ सोनल आदेश...५ जीवन एवुं जीवजो, अहिंशा बनो उदे्श... वेद रामायण वांचजो, (इ) आइ सोनल आदेश...६ सरस्वती सेवो सदा, भक्ति करो भवेश... उज्जवळ रीति आचरो, (इ) आइ सोनल आदेश...७ पढो सुविधा प्रेमथी, कायम समय संदेश... देव जाती दिपावजो, (इ) सोनल आदेश...८ प्रतिभा तेज प्रतापथी, नमे महान नरेश... एवा चारण अवतरो, (इ) आइ सोनल आदेश...९ धागा दोरा धुणवुं, काढो तुत कलेश... चारण ! पाखंड छोडजो, (इ) आइ सोनल आदेश...१० उज्जवळ करणी आचरो, व्रतधारी विशेष... जगदंबा जीभे जपो, (इ) आइ सोनल आदेश...११ जीवन तपेश्वरी जीवजो, वर्ण चारण विशेष... (तो) जगदंबा जनमशे, (इ) आइ सोनल आदेश...१२ तजो ...

Visri Mataji

💐 *धर्मना भाइ माटे बलिदान आपनार "आइ श्री विसरी माताजी"* 💐 कच्छनी केशरी भुमी माटे कविने लखवुं पडे छे... पथराळ,खळकाळ,विकराळ छतांय स्नेहनी सरिता वहावती बावळ तणी शुरो महीं पण प्रेम पुष्पो प्रगटावती कोरी भले कच्छ धरा पण रसाळ छे सदभावमां हम कच्छ धरानी विरवातो अमर छे इतिहासमां कच्छधरानी अनेक विर वातो,विर कथाओ,विरगाथाओ पाळीये पाळीये धरबायेली पडी छे. अनेक अपुज खांभीओ हजारो वर्षोथी इतिहासकथाओ साचवीने बेठी छे. कच्छना खंडेरो,मस्जीदो,मंदीरो,महेलो,समाधीओ,पथ्थरो,डुंगरो,वृक्षो,जंगलो,भेखडो अने वेरान रण पण विरगाथाओ इतिहास कथाओ साचवी बेठा छे. त्याग बलीदान विरता नेक टेक साहस खमीर अने समर्पणनी अनेक वातो कच्छना वृद्ध वडीलो साचवी बेठा छे श. एमनीपासे इतिहासनो गुप्त खजानो छे.. तो आवि ज एक सचववा जेवी भाई-बहेनना स्नेहनी अमरगाथा,धर्मना भाइ माटे बलिदान आपनार चारण माताजी आइ श्री विसरी माताजीनी इतिहास कथा पर द्रष्टिपात करीए... कच्छना कंठी विस्तारमां तुंणाथी सिंधोडी सुधी गढवीओना गाम एमां ववार,रागा,शेखडीया,मुंदरा(डुमरा),बुचडा,कपाया,बोराणा,ध्रब, झरपरा,शिराचा,नानी भुजपुर, अने भाडीया बधा नजीक...

Charan

*चारण साहित्य का इतिहास *| कड़ी - २५ | तीसरा अध्याय - प्राचीन काल* | धारावाहिक श्रंखला - प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित | सन्दर्भ - जीवनी खण्ड *१२. खेगार:-* ये महड़ू शाखा में उत्पन्न हुए थे और तत्कालीन ग्राम राजोला (सोजत) के, जो मेवाड़ में था, निवासी थे। ये लूंणपाल के वंशज थे। इनके समय में महाराणा कुम्भा सिंहासनारूढ़ थे, अत: ये उनके समकालीन प्रतीत होते हैं। इनके लिखे हुए फुटकर गीत मिलते हैं। *१३. बारू:-* सौदा बारहठ परिवार के मूल पुरुष के रूप में इनका नाम चिरकाल से विख्यात है। डॉ मेनारिया के अनुसार ये बोगसा खांप के चारण थे, जो सही नहीं है। वस्तुत: घोड़ों का व्यापार करने के कारण ये सौदा कहलाये। इसी प्रकार मेवाड़ के महाराणा कुम्भा का आश्रित होना भी संदिग्ध है। इनके पिता का नाम कर्मसेन था तथा माता बरबड़ी शक्ति का अवतार मानी जाती है। बरबड़ी के लिए प्रसिद्ध है कि उसने गिरनार के राजा नवघण यादव की फौज को कुल्लड़ी द्वारा तृप्त किया था और अन्नपूर्णा नाम प्राप्त किया था। इनके कुल में कवियों की एक समृद्धशाली परम्परा देखने को मिलती है, जो आधुनिक काल तक चलती रहती है। कहते हैं, एक बार इनक...

Raja Janak

*राजा जनक को आत्म ज्ञान की प्राप्ति?* मिथिला नामक देश में एक महाप्रतापी राजा हुए,उनका नाम महाराज जनक था । महाराज जनक को आत्मज्ञान के बारे में बहुत जिज्ञासा थी,और इस पर चर्चा के लिए उनके दरबार में हमेशा विद्वानों की महफ़िल बनी रहती थी ।  पर राजा जनक को जिस आत्मज्ञान की तलाश थी  उसके बारे में कोई विद्वान उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाता था । उन्हीं दिनों की बात है राजा जनक ने एक रात में सोते हुए एक सपना देखा कि वो अपनी बहुत सारी सेना के साथ जंगल में शिकार खेलने के लिए गए हुए हैं । एक जंगली सूअर का पीछा करते करते राजा जनक बहुत दूर तक निकल गए । उनकी सारी सेना पीछे छूट गयी और वह सूअर घने जंगल में बहुत दूर जाकर अदृश्य हो गया । राजा जनक  थककर चूर हो चूका थे उनकी पूरी सेना का कोई पता नहीं था । अब राजा को बहुत तेज भूख प्यास लगने लगी थी । बेचैन होकर राजा ने इधर उधर नजर दौड़ाई तो कुछ ही दूर पर उन्हें एक झोपड़ी नजर आई । जिसमें से धुआं उठ रहा था । राजा ने सोचा कि वहां कुछ खाने पीने के लिए मिल जायेगा । वो झोपड़ी में गये तो  देखा कि झोपड़ी के अन्दर एक बुढ़िया औरत बैठी हुई थी ।...

Sapakharu

||चांपराज वाळानुं सपाखरू||-गीगा बापु बारोट*                *||गीत सपाखरु||* वडां भारथां रचाया खेल कौरवारां पांडवारां कणॅ पारथारा जुध्द हुवा प्रले काळ बाणरा टंकार आरपार आसमान बागा पन्नगां थडक्का लागा सातमे पाताळ...(१) ठांकीया कौरवां बाणे पडी माथे मेधधारा छूटा बाण पारथारा आकरा समोह जाटा शुरधीर ठार ठार वीर रस जागा रोपीआ करणे पागा धाग धागां रोह...(२) कोदंडां छूटीया बाण भुजदंडां धरी कोप्या ब्रह्मंडां धणेण्या अळ्या पोरसाणा भाण हटाया पारथां रथां भलकारा दीया हरी पुत्र सूरजारा थारा अतागे प्रमाण...(३) बलाकारी कणॅ भारी पारथारि पोठ्या बाणे ठयाॅ विधिआरा धारा माटे नही काळ वेषधारी विपरारा अंतेकाळे आव्या हरी दाढ भांगी कंचनारी समप्पी दयाळ...(४) वखाणुं अखाडा बीजा सूयॅवंशी तणा वळी निवेडा भंडेरा लीआ जेताणारा नाथ जेम दळां वादळां जीं बादशाहा आया जारे भूप चांपराजे तारे मांडीयो भाराथ...(५) शीशने उतारी वाळा मुंडमाळा रोपी शिव हाल्या धडां भडेवाने तेग धारी हाथ पडे काळां धोम जाळां प्रलेकाळां जेम पोच्या भाण रथां खेंची जोवा लागीया भारथ...(६) सामसामा मळ्यां दळां भडेवान...

Charan Hun Mai

*चारण कवि श्री सूर्यदेवसिंह पाल्हावत रचित कविता* *||  चारण हु में ||* *चारण के आत्म गौरव का मंत्र* *चारण हूँ मैं* *मैं समुद्र की लहर, चंद्र की ज्योति,* *पुष्प की गन्ध, अथक विश्वास* *समय दर्पण हूँ मैं ||* *चारण हूँ मैं ||* *इतिहासों ने पढ़ा,* *रसों ने जिसको गाया* *तलवारों की छौहों ने,* *जिसको दुलराया,* *वही कलम का धनी,* *ज्ञान का कारण हूँ मैं ||* *चारण हूँ मैं ||* *मैं तांडव की ताल, ताल का नाद,* *नाद के स्वर, व्यंजन हूँ, शब्द युग्म हूँ|* *पुरुष पुरातन संभाषण का,* *गुरुकुल ऋषिगण उच्चारण का,* *छंदोबद्ध पठन-पाठन का,* *शुद्ध परिष्कृत मूर्त्त रूप हूँ|* *शतपथ ब्राह्मण अंकित वर्णित,* *वेद पुराण उपनिषद चर्चित* *चारण अवधारण का ध्वज हूँ|* *उन्न शिखर धवल चमकीले* *हिम अंचल से आया उतरा* *कोलवंश का राजहंस हूँ|* *युग से युग के और सदी से* *नयी सदी के सेतु बनाता* *वागीशा का वरद् पुत्र, सेवा* *अधिकारी|* *साबी, लूणी, माही, खारी,* *चम्बल, बनास व सिंधु तटों का विहरी प्रहरी|* *शस्य श्यामला अरावली की* *हरित-भरित घाटी का वासी|* *आर्य उन्नयन का अभिलाषी|* *रेतीले मरुध...