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Sapakharu

||चांपराज वाळानुं सपाखरू||-गीगा बापु बारोट*                *||गीत सपाखरु||* वडां भारथां रचाया खेल कौरवारां पांडवारां कणॅ पारथारा जुध्द हुवा प्रले काळ बाणरा टंकार आरपार आसमान बागा पन्नगां थडक्का लागा सातमे पाताळ...(१) ठांकीया कौरवां बाणे पडी माथे मेधधारा छूटा बाण पारथारा आकरा समोह जाटा शुरधीर ठार ठार वीर रस जागा रोपीआ करणे पागा धाग धागां रोह...(२) कोदंडां छूटीया बाण भुजदंडां धरी कोप्या ब्रह्मंडां धणेण्या अळ्या पोरसाणा भाण हटाया पारथां रथां भलकारा दीया हरी पुत्र सूरजारा थारा अतागे प्रमाण...(३) बलाकारी कणॅ भारी पारथारि पोठ्या बाणे ठयाॅ विधिआरा धारा माटे नही काळ वेषधारी विपरारा अंतेकाळे आव्या हरी दाढ भांगी कंचनारी समप्पी दयाळ...(४) वखाणुं अखाडा बीजा सूयॅवंशी तणा वळी निवेडा भंडेरा लीआ जेताणारा नाथ जेम दळां वादळां जीं बादशाहा आया जारे भूप चांपराजे तारे मांडीयो भाराथ...(५) शीशने उतारी वाळा मुंडमाळा रोपी शिव हाल्या धडां भडेवाने तेग धारी हाथ पडे काळां धोम जाळां प्रलेकाळां जेम पोच्या भाण रथां खेंची जोवा लागीया भारथ...(६) सामसामा मळ्यां दळां भडेवान...

Charan Hun Mai

*चारण कवि श्री सूर्यदेवसिंह पाल्हावत रचित कविता* *||  चारण हु में ||* *चारण के आत्म गौरव का मंत्र* *चारण हूँ मैं* *मैं समुद्र की लहर, चंद्र की ज्योति,* *पुष्प की गन्ध, अथक विश्वास* *समय दर्पण हूँ मैं ||* *चारण हूँ मैं ||* *इतिहासों ने पढ़ा,* *रसों ने जिसको गाया* *तलवारों की छौहों ने,* *जिसको दुलराया,* *वही कलम का धनी,* *ज्ञान का कारण हूँ मैं ||* *चारण हूँ मैं ||* *मैं तांडव की ताल, ताल का नाद,* *नाद के स्वर, व्यंजन हूँ, शब्द युग्म हूँ|* *पुरुष पुरातन संभाषण का,* *गुरुकुल ऋषिगण उच्चारण का,* *छंदोबद्ध पठन-पाठन का,* *शुद्ध परिष्कृत मूर्त्त रूप हूँ|* *शतपथ ब्राह्मण अंकित वर्णित,* *वेद पुराण उपनिषद चर्चित* *चारण अवधारण का ध्वज हूँ|* *उन्न शिखर धवल चमकीले* *हिम अंचल से आया उतरा* *कोलवंश का राजहंस हूँ|* *युग से युग के और सदी से* *नयी सदी के सेतु बनाता* *वागीशा का वरद् पुत्र, सेवा* *अधिकारी|* *साबी, लूणी, माही, खारी,* *चम्बल, बनास व सिंधु तटों का विहरी प्रहरी|* *शस्य श्यामला अरावली की* *हरित-भरित घाटी का वासी|* *आर्य उन्नयन का अभिलाषी|* *रेतीले मरुध...