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Charan

*चारण साहित्य का इतिहास

*| कड़ी - २५ | तीसरा अध्याय - प्राचीन काल*
| धारावाहिक श्रंखला - प्रत्येक मंगल, शुक्र एवं रविवार को प्रेषित
| सन्दर्भ - जीवनी खण्ड

*१२. खेगार:-* ये महड़ू शाखा में उत्पन्न हुए थे और तत्कालीन ग्राम राजोला (सोजत) के, जो मेवाड़ में था, निवासी थे। ये लूंणपाल के वंशज थे। इनके समय में महाराणा कुम्भा सिंहासनारूढ़ थे, अत: ये उनके समकालीन प्रतीत होते हैं। इनके लिखे हुए फुटकर गीत मिलते हैं।

*१३. बारू:-* सौदा बारहठ परिवार के मूल पुरुष के रूप में इनका नाम चिरकाल से विख्यात है। डॉ मेनारिया के अनुसार ये बोगसा खांप के चारण थे, जो सही नहीं है। वस्तुत: घोड़ों का व्यापार करने के कारण ये सौदा कहलाये। इसी प्रकार मेवाड़ के महाराणा कुम्भा का आश्रित होना भी संदिग्ध है। इनके पिता का नाम कर्मसेन था तथा माता बरबड़ी शक्ति का अवतार मानी जाती है। बरबड़ी के लिए प्रसिद्ध है कि उसने गिरनार के राजा नवघण यादव की फौज को कुल्लड़ी द्वारा तृप्त किया था और अन्नपूर्णा नाम प्राप्त किया था। इनके कुल में कवियों की एक समृद्धशाली परम्परा देखने को मिलती है, जो आधुनिक काल तक चलती रहती है। कहते हैं, एक बार इनको अपनी माता बरबड़ी की आज्ञानुसार महाराणा हमीरसिंह के समय में पांच सौ घोड़े लेकर गुजरात से मेवाड़ लाया गया। उस समय महाराणा को घोड़ों की पूर्ण आवश्यकता थी, किन्तु समय की गति से तत्क्षण उनका मूल्य नहीं चुकाया जा सकता था। उस परिस्थिति में इन्होंने अपने कुल घोड़े इस शर्त पर नजर कर दिये कि गया हुआ राज्य वापिस मिल जाय तो उचित कीमत चुका दें, अन्यथा कुछ नहीं। संयोगवश इन्हीं घोड़ों के बल पर महाराणा हमीरसिंह ने अपना खोया हुआ राज्य पुन: प्राप्त किया। तब घोड़ों की उचित कीमत के अतिरिक्त इस सेवा के उपलक्ष में महाराणा ने इनको अपना आदरणीय पोलपात बनाकर यथेष्ट जीविका एवं सम्मानादि प्रदान किये। इन्हें बारह गांव पुरस्कार में मिले जिनमें आँतरी गाँव प्रमुख केन्द्र था। इनके लिखे हुए स्फुट छंद उपलब्ध होते है।

*१४. टोडरमल:-* ये छांछड़ा शाखा में उत्पन्न हुए थे और सम्भवत: मेवाड़ के निवासी थे। इनके समय में महाराणा रायमल सिंहासनारूढ़ थे, अत: ये उनके समकालीन प्रतीत होते हैं। इनके लिये हुए फुटकर गीत मिलते हैं।

*१५. चन्द:-* ये झीमा चारणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे, किन्तु इनके पिता मघ भाटी राजपूत थे। मघ रोहड़ी कस्बे का राजा था। ये वहां से आये इसलिए रोहड़िया कहलाये। इनके समय में आलापुर-पाटण पर जयदेव सोलंकी का राज्य था। मारवाड़ नरेश राव धूहड़ का पुत्र रायपाल इनका भाणेज होता था जो बड़ा ही पराक्रमी था। वह राज्य-विस्तार की महत्वाकांक्षा से शत्रुओं को पराजित करता हुआ अपने मामा के घर पहुँचा और प्रणाम किया, जिसके उत्तर में मामा ने उसे 'अणदेव भाणेझ' कह दिया। इससे वह बिगड़ गया और पाटण नगरी को विध्वंस कर देने के लिए उद्यत हो गया। यह देखकर जयदेव ने उसे समझाया था कि जिन क्षत्रियों के पास चारण-देव नहीं होते, ये अणदेव ही कहलाते हैं। शिव शक्ति तो सबके देव है ही, किन्तु राजपूत राजा के पास चारण का रहना देवता का बास करना है। इस पर रायपाल ने कहा कि में चारण कहां से लाऊं? तब जयदेव ने उत्तर दिया कि रोड़ीशखर (सिंध) पर चन्द है। उसका जन्म चारण-स्त्री से हुआ है, उसे पकड़कर ले आओ और प्रलोभन अथवा भय से उसे चारण बना डालो। रायपाल ने ऐसा ही किया। वह अकस्मात धावा बोलकर चंद को पकड़ लाया, करीब एक महीने तक उसे पाटण में ही बंदी बनाये रखा और फिर मृत्यु तक की उसे धमकी दी। निदान इन्हें इच्छा के विरुद्ध रोहड़कर (बलपूर्वक) चारण बना लिया गया, इसलिए ये रोहड़िया कहलाने लगे। कहते हैं कि पाटण में जयदेव सोलंकी के राज्याश्रित कवि श्री आणन्द मीसण की कन्या के साथ इनका विवाह हुआ था। रायपाल इन्हें अपने साथ मारवाड़ ले आया तथा बारहठ उपटंक प्रदान किया। इतना ही नहीं, इन्हें बारह गांवो की बड़ी जागीर देकर राठौडों का पोलपात्र नियुक्त किया गया। तभी से रोहड़िया बारहठ राठौडों के पोलपात्र बने हुए हैं और राजस्थान के चारणों में अत्यंत आदर की दृष्टि से देखे जाते हैं। जिस दिन चंद को १२ वर्ष की अवस्था में बलात चारण बनाया गया, उस समय का एक प्राचीन छप्पय देखिये।

*बारै सै बासठे माह वद दस्सम सुक्कर।*
*चारण कीधो चंद, आथ सम्मपै इलावर।*
*नेग च्यार नवनिद्ध, रिद्ध दे भायप राखी।*
*राठोवड़ रोहड़ां, सदा चंद सूरज साखी।*
*पलटे न कोय पूरां पखां, वड़ै वंस अजवाळ वट।*
*रायपाळ साख तेरै तिलक, बारे साखां बारहट।।*

चंद के बारह पुत्र उत्पन्न हुए, जिनसे बारहठ चारणों की बारह शाखायें प्रसिद्ध हुई। आज भी ये शाखायें विद्यमान हें। चंद की कविता उपलब्ध नहीं होती, किन्तु इनके कुल में एक-एक से बढकर कवि हुए हैं।

*१६-१८ अमरा, गीधा एवं सूजा:-* चंद की वंश-परम्परा में अमरा, गीधा एवं सूजा नामक कवि हुए, जो मारवाड़ राज्यान्तर्गत बाड़मेर परगने के भादरेस गांव के निवासी थे। अमरा के पुत्र गीधा तथा गीधा के पुत्र सूजा हुए। इनमें से किसी की कविता उपलब्ध नहीं होती।

*१९. सहजपाल:-* ये गाडण शाखा में उत्पन्न हुए थे और सम्भवत: मारवाड़ राज्यान्तर्गत जालोर के निवासी थे। इनके समय में जालोर की राज्य-गद्दी पर राजा कानड़देव सोनगरा विराजमान थे। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने सन् १३११ ई० में जालोर पर आक्रमण किया। उस समय सहजपाल ने रण में शौर्य प्रदर्शित कर स्वामी के साथ वीरगति प्राप्त की थी। ये कानड़देव के सेनापति थे। इनकी फुटकर कविता कही जाती है।

*२०. मांडण:-* ये देवल शाखा में उत्पन्न हुए थे और जैसलमेर के महारावल दुर्जनशाल के समकालीन थे। इनके गांव का नाम दधवाड़ा था जो इन्हें सांखलों द्वारा प्राप्त हुआ था। इसी गांव के नाम के कारण इनके वंशज दधवाडिया कहलाये। जब सांखलों का राज्य चला गया तब उनके हाथ से भी यह गांव जाता रहा। ये अपने समय के एक प्रसिद्ध कवि एवं उच्च कोटि के भक्त थे।

*२१. बीसलदेव:-* आलोच्यकाल के मौलिक विचारकों में वीर बीसलदेव का नाम अग्रगण्य है। ठाकुर किशोरसिंह बार्हस्पत्य का कथन है कि सन् १४०८ ई० में परजिया शाखा का यह चारण सायला (काठियावाड) के पास आंबरड़ी ग्राम का निवासी था। इसे आंबरड़ी के साथ सात अन्य गांवों का स्वामित्व प्राप्त था। यह सरल, शांत एवं शुद्ध प्रकृति का व्यक्ति था। रात-दिन कड़ा परिश्रम करता रहता। हाथ से हल चलाकर खेती करने में इसे आनन्द मिलता। यह प्रत्येक व्यक्ति को यही उपदेश दिया करता था कि चोर और डाकुओं के अतिरिक्त सबको अपने पसीने की गाढ़ी कमाई खाने का अधिकार है। तत्कालीन हलवद नरेश का यह दायां हाथ था। इसके परिवार के दस अन्य चारण भी आंबरड़ी में ही रहते थे, जिनके नाम इस प्रकार है- नागार्जुन, भीमख, तेजख, लक्ष्मण, वंरिशल्य, पल्लव, आळग, रविया, साजण और धानख। वीसलदेव सूझ-बूझ में किसी से सानी नहीं रखता था। यह अपने ग्यारह मित्रों की मण्डली बनाकर विचार करने लगा कि इस संसार में जीवित अवस्था में तो सभी लोग अपनी मित्रता निभाते हैं परन्तु मृत्यु के उपरान्त किसी की मित्रता नहीं निभती क्योंकि यह ठिकाना नहीं कि कौन कब मरे? यह सुनकर सब मित्रों ने भगवती की शपथ लेकर रक्त-बिन्दुओं के अक्षरों में एक लेख लिखा जिसका सारांश यह था कि सब साथ-साथ जीयेंगे और मरेंगे। इसके पश्चात् सब अपने-अपने घर लौट गये।

कालान्तर में वीसलदेव के एक शत्रु कूकडिया चारण ने अहमदाबाद जाकर बादशाह के कान भरे, जिसके परिणाम-स्वरूप इस पर आक्रमण हुआ। उस समय यह जगदम्बा के अर्चन-पूजन में लीन था किन्तु पूजा समाप्त होने पर जब इसे इसका रहस्य सिपाही से ज्ञात हुआ तब इसने बादशाह को ऐसी खरी-खोटी सुनाई कि उसे अपने किये-कराये पर पश्चाताप होने लगा।

*~~क्रमशः*

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