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Vikat Rup Narshingh Bane



         श्री नरसिँह अवतार की स्तूति*

        ■◆■ ••• *बिकट रूप नरसिंघ बणे* •••■◆■
                   *।। दोहा ।।*

*समय एक प्रहलाद सूँ,कीन असुर अति क्रौध,*
 *कोट बिकट चहुँ दिश करी,जबर घेरी बङ जोध.*

*पिता दैत निज पुत्र से,बौलत है तिही बैर,*
 *कहै राम तव नाथ कित,तुरंत लैहूँ अब टैर.* 

*कठीन थँभ धखी लाल करी,बाहु खड्ग बिकराल*, 
*हरि बतावहूँ हाल मोही,करौँ पुत्र तब काल.*

                          *।। छंद: रेणकी ।।*
*सुनियत अत भ्रमत नमत मन हरिसन,भगत मुगत भगवत भजनं ,*
*सुरपत पत महत रहत रत समरत,सत द्रढ व्रत गत मत सजनं ,*
*धत लखत रखत जगपत उर धारण ,सुरत पुकारण श्रवण सुणै*,
*भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिँघ बणै ,*
                                     *जिय बिकट रूप नरसिंघ बणै {1}*

*कडडडड ब्रहमाँड इकि सह कडकत,अडड अडड दधिजल उछलं ,*
*धड धड धर धमक थडड भय भूधर,खडड मेरु शिव ध्यांन खुलं ,*
*तड तड सुर दुंद धडक असुरा तन,गडड हास्य अट हडड गणै*,
 *भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण, बिकट रुप नरसिँघ बणै {2}* 

*थररररर थंभ फटत धर थर हर,फरर कोट फर हरर फनं ,*
*डर डर मुख वकर भयंकर देखत,झरर तेज झर हरर तनं ,*
*कर कर जन अमर समर खय कर कर, डर डर दैत सु प्राण दणै ,*
*भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिँघ बणै {3}*

*कट कट रट भृकुट त्रकुट मुख भयकट, लपट झपट द्रग त्रगट ललं ,*
*झट पट अंग ऊलट पलट कर झंपिय,चपट चोट अति दुपट चलं ,*
*परगट झट पटक हिरण कश्यप प्रभु,खट खट घट नख फटत खणै,*
*भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिँघ बणै {4}*

*धक धक धक धधक धधक रुधिरन धक,थरक ऊझक झक शेष थियं,*
 *शक पक मग अरुण अरक रथ चुकिय,हक बक थक सब असुर हियं ,*
 *चक मक उर चमक दमक दैखत चख,भभक भभक रव घोर भणै ,*
 *भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिंघ बणै {5}*

*घणणणणण शंख दुदूँभी घौरण,भणण वेद मुख ब्रह्म भणै ,*
*झणणणण झणकार झरन फूलन झड,हणण दैत गण अगण हणै ,*
*बणणण बल बाहू गणण कुण बिक्रम, रियण नाद जय जय रयणै,*
 *भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण, बिकट रुप नरसिँघ बणै {6}*

*झळझळ अति कमळ न्रमळ मुख झळकत,भळळ तेजबळ प्रबळ भवं,*
*पळ पळ चल बिचळ रमा नहीँ पैखत,नकळ अकळ हरि रुप नवं ,*
*फल फल मुनि देव सकळ द्रग देखत,पल मह खल दल नाश पणै ,*
 *भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण,बिकट रुप नरसिंघ बणै {7}*

*जन जन धुनी सजन भगत जन जन प्रति,प्रसन वदन प्रहलाद परं ,*
*तन तन निज शरन चरन निज जन तिहि,धरन उरन शिर भूजन धरं ,* 
*प्रमि तन श्रुति भनन सनन सत वन प्रभु,घन "रवि"कवि जय शब्द घणै,*
 *भट थट असुरांण प्रगट घट भंजण, बिकट रुप नरसिंघ बणै {8}*
         *।। कळश छन्द :छप्पय ।।*
*नाथ जयति नरसिंघ,बिकट तन रुप बणावण*, 
*नाथ जयति नरसिंघ,निपट खल झुँड नशावण* , 
*नाथ जयति नरसिंघ,जपत जन कष्टहि जारन* ,
 *नाथ जयति नरसिंघ,बाहु बल दुष्ट बिडारन*,
*त्रय लोक श्याम समराथ तुंही, वेषहि अदभुत्त धर वयं*,
*कृत अमित नाथ "रवि"कवि कहत,नाथ जयति नरहरि जयं*,

कर्ता : *चारण कवि श्री रविराज सिंहढायच* मुळी सोराष्ट 
कवि श्री रविराज सिंहढायच कृत श्री नर्मदा लहरी माथी साभार

◆सम्पादन प्रकासन◆
 *श्री शंकरदानजी जेठीभाई देथा लिमडी कविराज*

★टाईप अने प्रेषित★
*चारण कवि प्रवीण मधुडा* राजकोट
97239 38056

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